फ़ुरसत में कभी...
अब भी बाकी है कहीं दायरों के उस पार का एहसास फ़साने जिसके सिर्फ़ फासलों में बयां हो अधूरे जिसके ख्वाब रह गए II बात पूरी नही हुई चिराग अब भी जल रही थी धुलते घुलते जज़्बात ओस बनकर बह गए कसक दिल में लिए अब भी कहीं हर लम्हे में इक सफर तय करते है II उम्मीद के साये में ही सही ज़िन्दगी बसर हो चली है इस सुरूर को किस रिश्ते का नाम दे महसूस करके देखो सिर्फ़ चाहत का नूर है तुमको भी महका देगी II अब भी लुत्फ़ लिए जाते है उन बातों का आँखें भी नम होती है यादों में सासों को रोक के रखा है गुज़रती ही नही इंतज़ार की आदत II जीते तो अब भी है चिराग भी जलाते है बातें भी होती है लेकिन महफ़िल ऐसी नही सजती जहाँ तुमारा ज़िक्र हो II